सरगुजा जिले में विंध्य पर्वतमाला पर समुद्रतल से करीब साढ़े तीन हजार फीट की ऊंचाई पर बसे मैनपाट को छत्तीसगढ़ का शिमला कहा जाता है। यहां का प्राकृतिक सौंदर्य, समुद्र तल से ऊंचाई, रमणीय स्थल व ठंड के दिनों में बर्फबारी शिमला में होने का अहसास कराती है।
मैनपाट की खूबसूरती देखनी हो तो फिर ठंड और बारिश के दिनों में यहां आए। इन दिनों यहां का सौंदर्य चरम पर होता है। गर्मी के दिनों में भी यहां का तापमान काफी ठंडा रहता है। इसलिए हर मौसम में सैलानी यहां खींचे चले आते हैं।
ऊंची-ऊंची पहाडिय़ों व वनों से आच्छादित करीब 13 किलोमीटर के इस हरियल इलाके में नदियां व झरने लोगों को आकर्षित करते हैं। यहां चारों ओर पसरी हरी घास दिल को सुकुन देती है। ठंड के दिनों में सुबह-सुबह बर्फ की सफेद चादर पूरी धरती को ढंक लेती है, जबकि बारिश में चारों तरफ हरियाली ही हरियाली बिखरी रहती है। इस दौरान यहां के झरने पूरे शबाब पर होते हैं।
झरनों का कल-कल नाद व पक्षियों की चहचहाहट लोगों को अपनी ओर खींच लेती है। यहां बारिश व ठंड में सबसे ज्यादा पर्यटक पहुंचते है लेकिन गर्मियों में भी यहां का ठंडा मौसम पर्यटकों को आकर्षित करता है। यहीं वजह है कि मैनपाट को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने की भी चर्चा है। जो लोग शिमला नहीं जा सकते वे छत्तीसगढ़ के इस इलाके में शिमला का मज़ा तो ले ही सकते हैं।
रास्ते भर रहता है रोमांच
जिला मुख्यालय अंबिकापुर से मैनपाट तक पहुंचने के दो रास्ते हैं। दरिमा हवाई पट्टी से मैनपाट का सफर 50 किमी का है, जबकि रायगढ़-काराबेल के रास्ते जाने पर 83 किमी की दूरी तय करनी पड़ती है। दोनों ही रास्ते पर मनोरम नजारे देखने को मिलते हैं लेकिन असली रोमांच दरिमा हवाई पट्टी से मैनपाट जाने में आता है।
नवानगर की तराई से मैनपाट पहुंचने चकाचक सड़क बनाई गई है। इस सड़क मैनपाट पहाड़ी का सफर बेहद रोमांचक है। पहाड़ के सीने को चिरते हुए टेढ़ा-मेढ़ा रास्ता ऊंचाई की ओर ले जाता है। अलग-अलग ऊंचाई से नीचे वादियों का दृश्य देखने लायक होता है।
वैसे तो यहां अनेक झरने, नदियां व मनोरम स्थल है लेकिन यहां पहुंचने पर टाइगर प्वाइंट, फिश प्वाइंट व मेहता प्वाइंट का नजारा नहीं देखा तो समझो कुछ भी नहीं देखा। स्थानीय लोग बताते हैं कि टाइगर प्वाइंट पर शेर पानी पीने आते थे। फिश प्वाइंट पर विभिन्न प्रजाति की मछलियां आप देख सकते हैं।
मेहता प्वाइंट पर सूर्योदय व सूर्यास्त का नजारा हमेशा के लिए आपके जेहन में बस जाएगा। यहां 'दलदली' में स्पंजी जमीन आपको प्रकृति के और करीब ले जाएगी। है। मैनपाट पहुंचने वाले सैलानी इस स्थल पर उछल-कूद कर भरपूर मजा लेते हैं।
छोटा तिब्बत भी कहते हैं इसे
मैनपाट की एक खूबी और है कि 1962 में यहां तिब्बतियों को शरणार्थी के रूप में बसाया गया था इसलिए इसे छोटा तिब्बत के नाम से भी जाना जाता है। यहां तिब्बती धर्मगुरु दलाईलामा दो बार आ चुके हैं। यहां तिब्बती कैंप व बौद्ध मंदिर पहुंचकर मन को शांति मिलती है। मैनपाट बेहतरीन कालीन पॉमेलियन कुत्तों के लिए भी मशहूर है।
बाक्साइट की अधिकता
मैनपाट में बाक्साइट खनिज प्रचूर मात्रा में है। बाल्को कंपनी यहां इस खनिज की खुदाई कर रही है। इसका उपयोग एल्यूमीनियम बनाने में किया जाता है। यह यहां रहने वाले कई लोगों के लिए यह आजीविका का साधन है। मजदूर वर्ग के लोग कंपनी के लिए बॉक्साइट का खनन करते हैं। लंबे समय से हो रहे बाक्साइट उत्खनन से मैनपाट की हरियाली को नुकसान पहुंचने की बात कही जा रही है। कुछ संस्थान इस उत्खनन का विरोध कर रही है।
Blogger :- Pushkar mishra 📝🖋️
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