बस्तर के संभागीय मुख्यालय से मात्र 40 किलोमीटर दूर है नारायणपाल मंदिर, निर्माण शैली वास्तुकला भी बेजोड़ है।
जगदलपुर में इंद्रावती और नारंगी नदी के संगम के पास नारायणपाल का 908 साल पुराना विष्णु मंदिर बस्तर में छिंदक नागवंशी राजाओं की वैभव का गौरवपूर्ण स्मारक है। यह मंदिर नागकालीन उन्नत वास्तुकला का बेहतर प्रमाण है। वहीं मंदिर में स्थापित शिलालेख यह स्पष्ट करता है कि हजार साल पहले भी बस्तर के रहवासी देवालय निर्माण में राजाओं को धन देकर सहयोग करते रहे हैं।
इन राजाओं ने किया निर्माण
लाल पत्थर से निर्मित करीब 70 फीट ऊंचे इस मंदिर का निर्माण नागवंशी नरेश जगदेक भूषण की विष्णु भक्त रानी ने सोमेश्वर देव की प्रेरणा से करवाया था। वहीं मंदिर के पास नारायणपुर नामक गांव भी बसाया जो कालांतर में नारायणपाल हो गया। इस मंदिर और गांव को कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही सन 1111 को विष्णु जी को अर्पित किया गया था।
तेरह मूर्तियां उपेक्षित पड़ी हैं
नारायणपाल से लगे ग्राम कुरूषपाल में ग्रामीण बुटुराम के खेत में भगवान आदिनाथ की हजारों साल पुरानी मूर्ति मिली है। ग्रामीण ने सोनारपाल के जैन धर्मावलंबियों की मदद से मंदिर बनवा दिया है। नारायणपाल के पास ही तिरथा नामक गांव है।
नारायणपाल से महज चार किमी दूर पूर्वी टेमरा के जंगल में 11 वीं शताब्दी की गजलक्ष्मी सहित तेरह मूर्तियां उपेक्षित पड़ी हैं। इसी तरह बोदरागढ़ के किला में दुर्लभ लज्जागौरी सहित कई दुर्लभ प्रतिमाएं उपेक्षित पड़ी हैं। इसकी जानकारी पुरातत्व विभाग को है लेकिन इन्हे संरक्षण देने इनके पास पिुलहाल कोई प्रोजेक्ट नहीं है। इन मूर्तियों की सुरक्षा के लिए केन्द्र और राज्य सरकार का पुरातत्व विभाग कुछ नहीं कर रहा है।
अवशेष अधिनियम 1958 के तहत संरक्षित है
जनसहयोग की पुष्टि नारायणपाल मंदिर के भीतर करीब आठ फुट ऊंचा एक शिलालेख है, जिसमें शिवलिंग, सूर्य-चंद्रमा के अलावा गाय और बछड़े की आकृति भी उकेरी गई है। शिलालेख के उकेरा गया है कि मंदिर के निर्माण में आसपास के कौन-कौन से गांव के किन लोगों में राजा को मंदिर निर्माण में सहयोग किया था। अब यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, भारत सरकार द्वारा प्राचीन मंदिर स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल व अवशेष अधिनियम 1958 के तहत संरक्षित है।
लेखक :- पुष्कर मिश्रा 📝🖋️