शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

Laxman temple, Sirpur Chhattisgarh

छत्तीसगढ़ एक ऐसी भूमि हैं जहां पर ऐतिहासिक देवालयों और ऐतिहासिकता की भरमार है। छत्तीसगढ़ में ऐसी कई जगह है जो पौराणिक है और जो पूरे देश के लोगों का मन लुभा रहें हैं । छत्तीसगढ़ की भूमि पर ऐसे कई जगह हैं जिसकी प्राकृतिक छटा और ऐतिहासिकता लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती हैं।

ऐसी ही जगहों में से एक है सिरपुर का लक्ष्मण मंदिर। जिसने छत्तीसगढ़ को विश्वस्तरीय पहचान दिलाई है। इसलिए आज हम आपको बताने जा रहे हैं छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध सिरपुर मंदिर का पूरा इतिहास।
सिरपुर छत्तीसगढ़ का एक ऐतिहासिक टूरिस्ट स्पॉट हैं जहां पर लोगों को पौराणिक कथाओं का भंडार और प्राकृतिक छटा दोनों का समान मात्रा में मिश्रण मिलता है। चारो ओर हरियाली के बीच बसा ये ऐतिहासिक मंदिर जहां जाते ही दिल को सुकुन मिलता है।

सिरपुर महानदी के तट पर बसा है जिसे छत्तीसगढ़ की गंगा कहा जाता है । इस ऐतिहासिक मंदिर की वास्तुकला और इसकी सांस्कृतिक विविधता के लिए यह पूरे देश में मशहुर है। सिरपुर को पहले श्रीपुर के नाम से जाना जाता था जिसे सोमवंशी शासकों के काल में दक्षिण कौशल की राजधानी बनाया गया था।
सिरपुर के इस भव्य मंदिर को छठी शताब्दी में निर्मित भारत की सबसे पहली इंटों से बनी मंदिर होने की ख्याती प्राप्त है। स्थापत्य शैली के साथ-साथ सिरपुर आध्यात्मिक ज्ञान और विज्ञान में प्रकाश डालने को भी प्रसिद्ध है।

इतिहास में दर्ज कथाओं के अनुसार, सोमवंश के राजा हर्षगुप्त की रानी ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था। लगभग 7 फुट ऊंची पाषाण निर्मित जगती पर स्थित यह मंदिर अत्यंत ही भव्य है। इस मंदिर में गर्भगृह, मंडप और अंतराल से समावेश हैं। मंदिर की बाहरी दीवारों पर विष्णु के प्रमुख अवतार विष्णु लीला के दृश्य भव्य अलंकार प्रतीक आदि का समावेश हैं।

लाल ईंटों से निर्मित लक्ष्मण मंदिर छत्तीसगढ़ के सिरपुर में सदियों से है, जब इसे बाहर से देखा जाता है, तो यह एक सामान्य हिंदू मंदिर जैसा दिखता है, लेकिन इसकी वास्तुकला, निर्माण और इस मंदिर के बनने के पीछे की कहानी के कारण लक्ष्मण मंदिर को लाल ताज महल भी कहा जाता है। इस मंदिर में जटिल नक्काशी और कला प्रतिनिधित्व हैं जो इस मंदिर को और अधिक आकर्षक बनाते हैं।
एक बहुत बड़े मंच पर पूरी तरह से ईंट से निर्मित यह अत्यंत विशाल मंदिर, भगवान विष्णु को समर्पित है उत्तर और दक्षिण दिशा से मंदिर के आंगन के शीर्ष तक पहुंचने के चरण हैं, मंदिर में एक गर्भगृह और मंडप शामिल हैं। अगर हम मंदिर के प्रवेश द्वार के बारे में बात करते हैं तो यह बहुत सुंदर है, जिसमें शेष भगवान विष्णु उत्कीर्ण हैं। विष्णु लीला के दृश्य और भगवान विष्णु के मुख्य अवतार भी वर्णित हैं।

सिरपुर के लक्ष्मण मंदिर का इतिहास
यह न केवल एक प्राचीन स्मारक है, बल्कि ‘गहरे प्रेम’ का एक अनूठा उदहारण है। यह पति के प्यार का प्रतीक है नागर शैली के मंदिर का निर्माण 735-40 ईस्वी में महाशिवगुप्त बालार्जुन के शासन के दौरान राजा हर्षगुप्त की याद में रानी वसाटा देवी के द्वारा बनवाया गया था। खुदाई में मिले शिलालेखों के अनुसार, यह अद्वितीय प्रेम स्मारक ‘ताजमहल से भी पुराना है। यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है लेकिन मंदिर के अंदर पांच फन वाले शेषनाग के रूप में लक्ष्मणजी की मूर्ति विराजमान है, इसलिए इसे लक्ष्मण मंदिर कहा जाता है।

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गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

Shivrinarayan temple, Janjgir champa (c.g.)

शिवरीनारायण भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के जांजगीर-चाम्पा ज़िले में स्थित एक नगर है। यह महानदी, शिवनाथ और जोंक नदी के त्रिधारा संगम के तट पर स्थित प्राचीन नगर है।
महानदी के तट पर बसे शिवरीनारायण नगर में 11 शताब्दी में हैह्य वंश के राजाओं के द्वारा लक्ष्मी नारायण मंदिर बनाया गया। हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार रामायण के समय से यहॉ शबरी आश्रम स्थित है। शिवरीनारायण मंदिर में वैष्णव समुदाय द्वारा वैष्णव शैली की अदभुत कलाकृतियॉ देखने को मिलती है।
शिवरीनारायण प्राकृतिक छटा से परिपूर्ण नगर है जो "छत्तीसगढ़ की जगन्नाथपुरी" के नाम से विख्यात है। यह बिलासपुर से ६४ कि. मी., राजधानी रायपुर से बलौदाबाजार से होकर १२० कि. मी., जांजगीर जिला मुख्यालय से 45 कि. मी., कोरबा जिला मुख्यालय से ११० कि. मी. और रायगढ़ जिला मुख्यालय से सारंगढ़ होकर ११० कि. मी. की दूरी पर अवस्थित है।
सौंदर्य और चतुर्भुजी विष्णु की मूर्तियों की अधिकता के कारण स्कंद पुराण में इसे श्री पुरूषोत्तम और श्री नारायण क्षेत्र कहा गया है। हर युग में इस नगर का अस्तित्व रहा है और सतयुग में बैकुंठपुर, त्रेतायुग में रामपुर और द्वापरयुग में विष्णुपुरी तथा नारायणपुर के नाम से विख्यात यह नगर मतंग ऋषि का गुरूकुल आश्रम और शबरी की साधना स्थली भी रहा है।  
 भगवान श्रीराम और लक्ष्मण शबरी के जूठे बेर यहीं खाये थे और उन्हें मोक्ष प्रदान करके इस घनघोर दंडकारण्य वन में आर्य संस्कृति के बीज प्रस्फुटित किये थे। शबरी की स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए "शबरी-नारायण" नगर बसा है।
 भगवान श्रीराम का नारायणी रूप आज भी यहां गुप्त रूप से विराजमान हैं। कदाचित् इसी कारण इसे "गुप्त तीर्थधाम" कहा गया है। याज्ञवलक्य संहिता और रामावतार चरित्र में इसका उल्लेख है। भगवान जगन्नाथ की विग्रह मूर्तियों को यहीं से पुरी (उड़ीसा) ले जाया गया था। प्रचलित किंवदंती के अनुसार प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा को भगवान जगन्नाथ यहां विराजते हैं।
प्राचीन काल से ही दक्षिण कौशल के नाम से जाने वाला यह क्षेत्र धार्मिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत समृध्द रहा है। यहां शैव, वैष्णव, जैन और बौद्ध धर्मो की मिली जुली संस्कृति रही है। 

छत्तीसगढ़ का यह क्षेत्र रामायणकालीन घटनाओं से भी जुडा हुआ है। इसे नारायण क्षेत्र या पुरूषोत्तम क्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है। यह क्षेत्र शिवरी नारायण के नाम से जाना जाता है।
छत्तीसगढ़ के जांजगीर जिला मुख्यालय से 45 किमी की दूरी पर मैकल पर्वत श्रृंखलाओ के मध्य शिवनाथ, जोंक और महानदी के संगम पर स्थित शिवरी नारायण को तीर्थ नगरी प्रयाग जैसी मान्यता मिली है। 

यहाँ पर छत्तीसगढ़ का प्रसिद्ध शिवरी नारायण मंदिर है। ऐसी मान्यता है कि वनवास काल में भगवान श्री राम को यहीं पर शबरी ने बेर खिलाये थे अत: शबरी के नाम पर यह शबरीनारायण हो गया और कालांतर मे इसका नाम बिगाडकर शिवरी नारायण पड गया। 
यहां पर शबरी के नाम से ईटों से बना प्राचिन मंदिर भी है। पर्यटन की दृष्टी से यह स्थल अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहां अत्यंत प्राचीन मन्दिर समूह है। 

इस मंदिर को बडा मंदिर एवं नरनारायण मंदिर भी कहा जाता है। उक्त मंदिर प्राचीन स्थापत्य कला एवं मुर्तिकला का बेजोड नमूना है। 
ऎसी मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण राजा शबर ने करवाया था। ९वीं शताब्दी से लेकर १२वीं शताब्दी तक की प्राचीन मुर्तियो की स्थापना है।

 मंदिर की परिधि १३६ फीट तथा ऊंचाई ७२ फीट है जिसके ऊपर १० फीट के स्वर्णीम कलश की स्थापना है शायद इसीलिये इस मंदिर का नाम बडा मंदिर भी पडा। 
सम्पूर्ण मंदिर अत्यन्त सुंदर तथा अलंकृत है जिसमे चारो ओर पत्थरों पर नक्काशी कर लता वल्लरियों व पुष्पों से सजाया गया है। मंदिर अत्यंत भव्य दिखायी देता है।
यहां भगवान शिव का प्राचीन मंदिर भी स्थित है जिसे चंद्रचूड़ महादेव के नाम से पूजा जाता है।इस मंदिर में स्थित वटवृृक्ष की एक खासियत है कि वृक्ष के पत्तों की आकृृति ‌‌‌दोनाकार रूप में रहती हैंं।

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Chitrakoot waterfall,Bastar Chhattisgarh

       
चित्रकोट जलप्रपात

चित्रकोट जलप्रपात भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर ज़िले में इन्द्रावती नदी पर स्थित एक सुंदर जलप्रपात है। इस जल प्रपात की ऊँचाई 90 फीट है।इस जलप्रपात की विशेषता यह है कि वर्षा के दिनों में यह रक्त लालिमा लिए हुए होता है, तो गर्मियों की चाँदनी रात में यह बिल्कुल सफ़ेद दिखाई देता है।

जगदलपुर से 40 कि.मी. और रायपुर से 273 कि.मी. की दूरी पर स्थित यह जलप्रपात छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा, सबसे चौड़ा और सबसे ज्यादा जल की मात्रा प्रवाहित करने वाला जलप्रपात है। 
यह बस्तर संभाग का सबसे प्रमुख जलप्रपात माना जाता है। जगदलपुर से समीप होने के कारण यह एक प्रमुख पिकनिक स्पाट के रूप में भी प्रसिद्धि प्राप्त कर चुका है। अपने घोडे की नाल समान मुख के कारण इस जाल प्रपात को भारत का निआग्रा भी कहा जाता है। 
चित्रकूट जलप्रपात बहुत ख़ूबसूरत हैं और पर्यटकों को बहुत पसंद आता है। सधन वृक्षों एवं विंध्य पर्वतमालाओं के मध्य स्थित इस जल प्रपात से गिरने वाली विशाल जलराशि पर्यटकों का मन मोह लेती है।

‘भारतीय नियाग्रा’ के नाम से प्रसिद्ध चित्रकोट प्रपात वैसे तो प्रत्येक मौसम में दर्शनीय है, परंतु वर्षा ऋतु में इसे देखना अधिक रोमांचकारी अनुभव होता है। वर्षा में ऊंचाई से विशाल जलराशि की गर्जना रोमांच और सिहरन पैदा कर देती है।
वर्षा ऋतु में इन झरनों की ख़ूबसूरती अत्यधिक बढ़ जाती है।जुलाई-अक्टूबर का समय पर्यटकों के यहाँ आने के लिए उचित है।चित्रकोट जलप्रपात के आसपास घने वन विराजमान हैं, जो कि उसकी प्राकृतिक सौंदर्यता को और बढ़ा देती है।
रात में इस जगह को पूरा रोशनी के साथ प्रबुद्ध किया गया है। यहाँ के झरने से गिरते पानी के सौंदर्य को पर्यटक रोशनी के साथ देख सकते हैं।अलग-अलग अवसरों पर इस जलप्रपात से कम से कम तीन और अधिकतम सात धाराएँ गिरती हैं।

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Rajiv Lochan temple & kuleshwar mahadev temple Rajim gariyaband Chhattisgarh

राजीव लोचन मंदिर अपनी शानदार वास्तुकला और समृद्ध विरासत के लिए लोकप्रिय है जो भगवान विष्णु को समर्पित है। मंदिर के चारों ओर सौंदर्यपूर्ण पत्थर की नक्काशी है। यह मंदिर नदियों के संगम पर स्थित है, इस क्षेत्र को छत्तीसगढ़ का प्रयाग भी कहा जाता है, माघ पूर्णिमा पर राजीव लोचन मंदिर में मेला आयोजित किया जाता है, जिसमें देश भर से श्रद्धालु भाग लेते है।

राजीव लोचन मंदिर
छत्तीसगढ़ का प्रसिद्ध एवं प्रमुख मंदिरों में से एक है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के पास राजिम में भगवान विष्णु के चार रूपों को समर्पित भगवान राजीव लोचन मंदिर हैं। जहाँ हर साल हजारों भक्त दर्शन के लिए आते हैं। राजीव लोचन मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है ।

नदियों के संगम पर स्थित है, मंदिर के अंदर दशावतार और बाल मुकुंद जी के मंदिर हैं। राजिम बस्ती में लगभग 22 मंदिर हैं। मंदिर विशाल है कहा जाता है कि उनकी मूर्ति श्री जानकीजी द्वारा स्थापित की गई थी।
इस क्षेत्र को छत्तीसगढ़ का प्रयाग भी कहा जाता है, माघ पूर्णिमा पर यहाँ मेला आयोजित किया जाता है, जिसमें देश भर से श्रद्धालु भाग लेते हैं। राजीव लोचन मंदिर में प्राचीन भारतीय संस्कृति और शिल्प का अनूठा संगम है। लोगों का मानना ​​है कि भगवान विष्णु इस मंदिर में विश्राम करने आते हैं।


सोंधुर-परी-महानदी संगम के पूर्व में स्थित राजिम, प्राचीन काल से छत्तीसगढ़ का एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक केंद्र रहा है। यह रायपुर से दक्षिण-पूर्व में 45 किमी की दूरी पर देवभोग की ओर जाने वाली सड़क पर स्थित है।
 राजिवलोचन मंदिर अपनी भव्यता और वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर का निर्माण प्राचीन शिल्प कला का एक अद्भुत नमूना है। इस स्थान का प्राचीन नाम पद्मावती था और इसे बाद में राजिम नाम दिया गया था।
राजिम में एक जैन मंदिर भी है। यहां जैन समुदाय की विशेष आस्था का केंद्र है, उनके दर्शन करने से भी पुण्य की प्राप्ति होती है और हमें उनके त्याग और बलिदान से प्रेरणा लेनी चाहिए। राजिम छत्तीसगढ़ का मुख्य मंदिर है। जगन्नाथ के यहाँ से लौटने वाले यात्री अक्सर राजिम लोचन जाते हैं।

राजीव लोचन मंदिर का इतिहास

इस मंदिर का निर्माण 5 वीं शताब्दी में किया गया था। इस मंदिर के अंदर 1197 A.D. का एक शिलालेख है। यह जानकारी उसी से प्राप्त की गई है। इस स्थान का प्राचीन नाम कमलक्षेत्र है। ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मांड की शुरुआत में भगवान विष्णु की नाभि से निकला कमल यहीं स्थित था और ब्रह्मा जीए ने ब्रह्मांड की रचना यहां से की थी इसीलिए इसका नाम कमलक्षेत्र रखा गया। राजिम को छत्तीसगढ़ का प्रयाग माना जाता है, जो पैरी नदी, सोंढूर नदी और महानदी का संगम है। इस स्थान पर अस्थि विसर्जन और पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण किया जाता है।
"कुलेश्वर महादेव'' मंदिर जो त्रिवेणी के बीच में स्थित है, उसके महामंडप के पास एक शिलालेख है जिसके अनुसार यह मंदिर 8-9 वीं शताब्दी का निर्मित है।

 यह मंदिर उस समय के तकनीकी ज्ञान का जीवंत प्रमाण है। बरसात में नदी की बाढ़ से उसकी रक्षा के लिये चबूतरे को विशेष रुप से ऊंचा बनाया गया था। इसके अलावा जितनी ऊंचाई पर मंदिर है, उतनी ही नहीं बल्कि उससे भी अधिक मंदिर के नीचे नींव भी मजबूत पत्थरों से घिरी हुई है। 
सन् 1967 में राजिम में जब बाढ़ आई थी तब यह मंदिर पूरा डूब चुका था। केवल कलश भाग दिखाई देता था। लेकिन बाद में पानी नीचे उतर जाने के पश्चात् देखा गया कि कोई नुकसान नहीं हुआ। इस मंदिर के शिवलिंग की मूर्ति में पैसा डालने से वह नीचे चला जाता है और की प्रतिध्वनि गूंजित होती है।

राजिम - एक संगम स्थल

राजिम को इलाहाबाद जैसा एक संगम स्थल माना गया है। यहाँ पर 8-9 वीं शताब्दी के प्राचीन मंदिरों से लेकर वर्तमान में कई जातियों एवं सम्प्रदायों के देवालय निर्मित हो गये। लोग राजिम को छत्तीसगढ़ का प्रयाग मानते हैं, यहाँ पैरी नदी, सोंढुर नदी और महानदी का संगम है। इसीलिये इस संगम में अस्थि विसर्जन तथा संगम किनारे पिंडदान, श्राद्ध एवं तपंण किया जाता है। वर्तमान समय राजिम में रोज़ लगभग पचास पिण्डदान का कार्य हो रहा है।

पिण्डदान के पश्चात् राजीव लोचन के दर्शन करने के बाद ही लोग वापस लौटते हैं। राजीव लोचन का प्रसाद चावल से बना पीड़ियाँ सभी जाति सम्प्रदाय के लोग साथ ले जाते हैं। खासकर अस्थि विसर्जन व पिंडदान के बाद तो ले ही जाते है। कई गावों में इन पीड़ियों को सुरक्षित रख दिया जाता है क्योंकि वे मानते हंै कि किसी को मृत्यु के कुछ धंटे पहले यह प्रसाद अगर खिलाया जाये तो उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है। पीड़िया बहुत साल तक रख सकते है। राजीव लोचन को प्रसाद-पीड़ियों का महत्व इस प्रकार बहुत ज्यादा है।

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बुधवार, 28 अप्रैल 2021

ओनाकोना मंदिर बालोद, छत्तीसगढ़


ओना कोना मंदिर
यह रायपुर से लगभग 90 किलोमीटर, धमतरी से 35 किलोमीटर, बालोद से 50 किलोमीटर की दूरी पर ओनाकोना मंदिर स्थित है।शिव को समर्पित यह मंदिर – ओनाकोना मंदिर भगवान शिव को समर्पित एक हिन्दू मंदिर है।
मजार का निर्माण – 
ओनाकोना मंदिर के पास में एक मजार भी है जो सूफी संत बाबा फरीद यहां समय  व्यतीत किए थे,उनकी याद में बनायी गयी है।
आकर्षक ओनाकोना मंदिर की दीवारों पर अनेक देवी देवताओं की सुंदर मूर्ति दीवारों पर उकेरी गई है।जो इस मंदिर को और भी खूबसरत बनाता है।
पर्यटक स्थल – ओनाकोना मंदिर पर्यटकों के आकर्षक का केंद्र है पर्यटक यहां दूर – दूर से इस मंदिर को देखने के लिए आते हैं।
राम की मूर्ति –मंदिर परिसर में श्री राम भगवान की एक सुंदर मूर्ति बनाया गया है जो पर्यटकों को काफी पसंद आता हैै।
गुरूर ब्लाक के अंतिम छोर पर बसे कर्रेझर के आश्रित ग्राम ओनाकोना में निर्माणाधीन आकर्षक मंदिर यहां की विशेष पहचान बनी हुई है।
ओनाकोना मंदिर जहां पर बनाया गया उसके आस – पास और भी मंदिर बनाया गया है । जो प्राकृतिक दृश्य और सुंदर वातावरण का अनुभव करता है।
 ओनाकोना मंदिर बालोद जिला का खूबसूरत मंदिर है।
ओनाकोना मंदिर की दीवारों में सुंदर कलाकृति की गई है जो मूर्ति को और भी बेहद ही खूबसूरत बनाता है।
पिकनिक स्पॉट – ओनाकोना मंदिर एक सुंदर पिकनिक स्पॉट है यहां पर आप बोटिंग, पिकनिक कैपिंग और ट्रेकिंग के लिए भी यहां आ सकते है।
गंगरेल बांध का एक छोर – ओना कोना गंगरेल बांध का एक छोर है और यहां बारो महिने पानी रहता और यह समुद्र जैसी लहरे उठती है।

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नारायण पाल मंदिर, बस्तर छत्तीसगढ़

बस्तर के संभागीय मुख्यालय से मात्र 40 किलोमीटर दूर है नारायणपाल मंदिर, निर्माण शैली वास्तुकला भी बेजोड़ है। जगदलपुर में इंद्रावत...