गुरुवार, 20 मई 2021

नारायण पाल मंदिर, बस्तर छत्तीसगढ़

बस्तर के संभागीय मुख्यालय से मात्र 40 किलोमीटर दूर है नारायणपाल मंदिर, निर्माण शैली वास्तुकला भी बेजोड़ है।

जगदलपुर में इंद्रावती और नारंगी नदी के संगम के पास नारायणपाल का 908 साल पुराना विष्णु मंदिर बस्तर में छिंदक नागवंशी राजाओं की वैभव का गौरवपूर्ण स्मारक है। यह मंदिर नागकालीन उन्नत वास्तुकला का बेहतर प्रमाण है। वहीं मंदिर में स्थापित शिलालेख यह स्पष्ट करता है कि हजार साल पहले भी बस्तर के रहवासी देवालय निर्माण में राजाओं को धन देकर सहयोग करते रहे हैं।

इन राजाओं ने किया निर्माण
लाल पत्थर से निर्मित करीब 70 फीट ऊंचे इस मंदिर का निर्माण नागवंशी नरेश जगदेक भूषण की विष्णु भक्त रानी ने सोमेश्वर देव की प्रेरणा से करवाया था। वहीं मंदिर के पास नारायणपुर नामक गांव भी बसाया जो कालांतर में नारायणपाल हो गया। इस मंदिर और गांव को कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही सन 1111 को विष्णु जी को अर्पित किया गया था।
तेरह मूर्तियां उपेक्षित पड़ी हैं
नारायणपाल से लगे ग्राम कुरूषपाल में ग्रामीण बुटुराम के खेत में भगवान आदिनाथ की हजारों साल पुरानी मूर्ति मिली है। ग्रामीण ने सोनारपाल के जैन धर्मावलंबियों की मदद से मंदिर बनवा दिया है। नारायणपाल के पास ही तिरथा नामक गांव है। 
नारायणपाल से महज चार किमी दूर पूर्वी टेमरा के जंगल में 11 वीं शताब्दी की गजलक्ष्मी सहित तेरह मूर्तियां उपेक्षित पड़ी हैं। इसी तरह बोदरागढ़ के किला में दुर्लभ लज्जागौरी सहित कई दुर्लभ प्रतिमाएं उपेक्षित पड़ी हैं। इसकी जानकारी पुरातत्व विभाग को है लेकिन इन्हे संरक्षण देने इनके पास पिुलहाल कोई प्रोजेक्ट नहीं है। इन मूर्तियों की सुरक्षा के लिए केन्द्र और राज्य सरकार का पुरातत्व विभाग कुछ नहीं कर रहा है।
अवशेष अधिनियम 1958 के तहत संरक्षित है
जनसहयोग की पुष्टि नारायणपाल मंदिर के भीतर करीब आठ फुट ऊंचा एक शिलालेख है, जिसमें शिवलिंग, सूर्य-चंद्रमा के अलावा गाय और बछड़े की आकृति भी उकेरी गई है। शिलालेख के उकेरा गया है कि मंदिर के निर्माण में आसपास के कौन-कौन से गांव के किन लोगों में राजा को मंदिर निर्माण में सहयोग किया था। अब यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, भारत सरकार द्वारा प्राचीन मंदिर स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल व अवशेष अधिनियम 1958 के तहत संरक्षित है।

लेखक  :- पुष्कर मिश्रा 📝🖋️


बुधवार, 12 मई 2021

सतरेंगा पिकनिक स्पॉट,कोरबा छत्तीसगढ़

नमस्‍कार दोस्‍तों आज का ब्‍लाग पोस्‍ट सतरेंगा पिकनिक स्‍पॉट के बारे में है, जो कि कोरबा जिले का एक बहुत ही खुबसुरत पिकनिक स्‍पाट है, हर साल यहां सैकड़ो कि संख्‍या में टुरिस्‍ट आते हैं, यह सुंदर पिकनिक स्‍पाट कोरबा शहर से लगभग 38 कि.मी. और बिलासपुर शहर से लगभग 126 कि.मी. की दूरी पर हसदेव-बांगो रिसर्वायर में सतरेंगा गांव के पास स्थित है, जहां पहाड़ो से घिरे इस झील का आनंद लेने के लिए छत्‍तीसगढ़ के कोने-कोने से लोग यहां आते हैं।इसे यहां के लोग मिनी गोवा भी कहते हैं।
सतरेंगा के इस सुदर पिकनिक स्‍पॉट को विकसित करने के लिए छत्‍तीसगढ़ सरकार द्वारा यहां फरवरी 2020 में हुई मीटिंग के बाद इस जगह को और भी बेहतर बनाया जा रहा है, यहां खुबसुरत गार्डन का निर्माण, रेस्‍ट हाउस, वाटर स्‍पोर्टस और टिकिटिंग की भी व्‍यवस्‍था बनाई जा रही है, वैसे तो यहां लोगो की भीड़ फैमिली और दोस्‍तों के साथ पिकनिक या बोटिंग, नेचर कैम्‍पिंग के लिए ही होती है, पर रेस्ट हाउस बन जाने के बाद लोग यहां रूककर प्रकृति के बीच रहकर अपने फैमिली के साथ समय व्‍यतीत कर पायेंगे सतरेंगा पिकनिक स्‍पॉट के पास कुछ और टुरिस्‍ट प्‍लेसेस भी हैं, जहां पर भी काफी भीड़ होती है, इनमें शामिल है- देवपहरी जलप्रपात, हसदेव-बांगो डैम, बुका जल-विहार और गोल्‍डन आइलैंड ।
सतरेंगा कोरबा 
अगर आप यहां घुमने के लिए प्‍लान कर रहे हैं, तो आपको इस जगह के कुछ दर्शनीय जगहों के बारे में जान लेना चाहिए । यहां पहुंचने पर सबसे पहले आपको दुर से ही एक खुबसुरत महादेव पहाड़ का नजारा दिखेगा जो इस जगह का एक दर्शनीय स्‍थल है जहां बहुत सारे लोग इस नेचुरल ब्‍युटी की फोटो भी लेने जाते हैं, इसके अलावा आपको यहां एक 1400 साल पुराना साल वृक्ष(Soreya Robasta) भी देखने को मिलेगा यह आपको सतरेंगा गांव की बस्‍ती से लगभग 500 मी. की दूरी पर पड़ेगा । 
आने वाले समय में दोस्‍तो यह सतरेंगा कोरबा जिले और छत्‍तीसगढ़ का एक बहुत ही प्रचलित पिकनिक स्‍पॉट बन जाएगा। आज भी यहां लोग बोटिंग और कैम्‍पिंग के लिए खासकर आते हैं, यहां इस जगह की डेवलपमेंट मीटिंग के बाद एक कैन्‍टिन एरिया भी बनाया गया है, जहां तरह-तरह के खाने की चीजें आपको देखने को मिलेंगी यह दुकाने महीला समुह द्वारा चलाई जाती है, जिनसे उनको काम और टुरिस्‍ट्स के लिए एक अच्‍छा टुअर अनुभव मिल पाता हैं। 
दोस्‍तो मेरा इस सतरेंगा पिकनिक स्‍पॉट का अनुभव काफी अच्‍छा रहा था। यहां का नजारा बहुत मनमोहक है, यहां के पहाड़, झील से घिरा यह पिकनिक स्‍पॉट आपको एक रिलीफ का एहसास दिलाता है, शहर से दूर गांव मे बसे इस सतरेंगा पिकनिक स्‍पॉट की खुबसुरती अतुल्‍यनीय है।

Blogger :- Pushkar mishra 📝🖋️

शनिवार, 8 मई 2021

मां महिषासुर मर्दिनी मंदिर चैतुरगढ़ कोरबा छत्तीसगढ़

प्रसिद्ध चैतुरगढ़ का किला छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में आता है। इस किले को लाफागढ़ किला नाम से भी जाना जाता है। इस किले को प्राकृतिक महत्व तो है ही लेकिन साथ ही इस किले को वास्तुकला की दृष्टि से देखा जाए तो इसका महत्व और भी बढ़ जाता है।

चैतुरगढ़ किले की वास्तुकला – 

प्रसिद्ध महिषासुर मर्दिनी मंदिर भी यहीपर है। यहाँ के मंदिर में महिषासुर मर्दिनी की 12 हातोवाली मूर्ति स्थापित की गयी है। इस मंदिर से 3 किमी की दुरी पर शंकर गुफा है। यह गुफा एक सुरंग की तरह है जो की 25 फूट की है। इस गुफा का आकार बहुत छोटा होने के कारण इसमें से रेंगते हुए ही जाना पड़ता है।

इस चैतुरगढ़ या लाफागढ़ किले की दीवारे एक तरह से ने ना होने के कारण हमें इसकी दीवारे कई जगह पर छोटी तो कई जगह पर मोटी देखने को मिलती है। किले के प्रवेश द्वार बहुत ही खुबसूरत तरीक़े से बनाया गया है। इसमें कई सारे स्तंभ और मुर्तिया भी देखने को मिलती है।
यहां पर एक बहुत बड़ी गुबंद है जो मजबूत स्थम्भो पर बनायीं गयी है। इस गुबंद को आधार देने के लिए पाच स्तंभ बनवाये गए थे।

किले के बाजु में जो पहाड़ी है उसके आजूबाजू में पाच तालाब थे जो की करीब 5 वर्ग किमी में फैले हुए थे। उन पाच तालाबो में से तीनतालाब साल भर पानी से भरे रहते थे।

किले को मेनका, हुम्कारा और सिंहद्वार नामके तीन सबसे अहम द्वार माने जाते है।

बहुत सारे किले को एक ही नाम दिया जाता है। लेकिन चैतुरगढ़ के किले को एक नहीं बल्कि दो नाम दिए गए है। और यही इस किले की खासियत है। इस किले को चैतुरगढ़ के साथ साथ लाफागढ़ किला नाम से भी जाना जाता है।

चैतुरगढ़ किले का इतिहास – 

ऐतिहासिक दृष्टि से चैतुरगढ़ किले को बहुत ही महत्व प्राप्त है। पुरातत्वविद इस किले को एक प्राकृतिक और मजबूत किला मानते है। कुछ का ऐसा भी मानना है मध्य प्रान्त और बेरार में मिले कुछ शिलालेख बताते है यह किला 933 कलचुरी के ज़माने का है और उस वक्त कलचुरी राजा का शासन था।

ऐसा माना जाता है की यहाँ का राजा हैहाया परिवार का था और उसे अठरा लड़के थे। उस राजा के लडको में से एक का नाम कलिंगा था और उस कलिंगा का लड़का कमला राजा था। कमला राजा ने तुम्मना पर कई सालो तक शासन किया था। लेकिन कमला राजा को रत्नराजा 1 ने हराया था।

लेकिन रत्नराजा के बाद पृथ्वीदेव ने शासन किया। ऐसा कहा जाता है की इस किले का निर्माण राजा पृथ्वीदेव ने करवाया था। भारत का पुरातत्व विभाग इस किले की देखभाल का काम देखता है।
और सबसे बड़ी और चौकाने वाली बात यह है की यह किला इतना उचाई पर होने के बाद इसके सबसे ऊपर के इलाके में एक नहीं बल्की पुरे पाच तालाब है और उनमेसे ज्यादातर तालाबो में साल भर पानी भरा रहता है।
         किले से जंगल का मनमोहक दृश्य
शीत ऋतु के मौसम में पहाड़ों पर कोहरे की चादर
खोजकर्ताओं  द्वारा ली गई किले की बहुत पुरानी तस्वीर।
         किले से पहाड़ियों का सुंदर नजारा

Blogger :- Pushkar mishra 📝🖋️

शुक्रवार, 7 मई 2021

सीता देवी मंदिर ,देवरबीजा बेमेतरा छत्तीसगढ़

सीता मंदिर बेमेतरा जिले का एक अत्‍यधिक सुंदर प्राचीन मंदिर हैं, यह मंदिर एक तालाब के किनारे स्थित हैं,  यह मंदिर देवरबीजा, बेमेतरा जिले में हैं, जो बिलासपुर से लगभग 108 कि.मी. हैं, और बेमेतरा जिला मुख्‍यालय से लगभग 17 कि.मी. हैं, मंदिर पुरातात्‍विक दृष्टि से बहुत ही महत्‍वपूर्ण हैं, और पर्यटन स्‍थल के रूप में लोगो के बीच प्रसिद्ध हैं |


दोस्‍तो देवरबीजा का यह खुबसूरत मंदिर लोगो और प्राचीन या पुरातात्‍विक जगहों को पसंद करने वालो के बीच काफी प्रसिद्ध हैं, इसलिए यहां पर्यटक आते रहते हैं, और आप भी यहॉं आसानी से आ सकते आपको यह मंदिर बेमेतरा-दुर्ग के मार्ग पर देवरबीजा पर पड़ेगा जहॉ आप बस, ऑटो या किसी अन्‍य साधन से आ सकते हैं मंदिर देवरबीजा बस स्‍टैण्‍ड से लगभग 1.5 कि.मी. की दूरी पर खुबसुरत तालाब के किनारे स्थित हैं |

सीता मंदिर देवरबीजा पर्यटल स्‍थल का इतिहास

सीता मंदिर एक पुरातात्‍विक धरोहर हैं, और पुरातात्‍विक दृष्टि से महत्‍वपूर्ण हैं, इस मंदिर को बारहवी शताब्‍दी का बना हुआ कहा जाता है, जिसे कल्‍चुरी राजाओं द्वारा बनवाया गया और यह मंदिर नागर शैली में बना हुआ हैं,, मंदिर को भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण विभाग (Archeological survey of india) के द्वारा एक संरक्षित स्‍मारक का दर्जा भी प्राप्‍त हैं, बेमेतरा जिले में काफी पुरात्‍तव के अवशेष मिले हैं, जिसमें इस सुंदर मंदिर के अलावा सहसपुर के हनुमान मंदिर और अन्‍य मंदिर भी शामिल हैं, गंडई का देउर शिव मंदिर भी इस मंदिर से लगभग 70-80 कि.मी. की दूरी पर हैं, इस पुर्वाभिमुखी मंदिर के सामने एक तालाब हैं और एक सती स्‍तम्‍भ भी हैं मंदिर परिसर के बाहर पुरातात्‍विक भाग का एक छोटा सा देखरेख करने के लिए ऑफिस भी हैं |


Blogger :- Pushkar mishra 📝🖋️

गुरुवार, 6 मई 2021

बारसूर गणेश जी मंदिर, दंतेवाड़ा छत्तीसगढ़



दक्षिण बस्तर दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय से 31 किमी तथा राजधानी से 395 किमी दूर बारसूर में स्थित है, 32 खंबों वाला यह ऐतिहासिक मंदिर। दो गर्भगृह वाले इस मंदिर में दो शिवलिंग स्थापित हैं। 895 वर्ष पुराने इस मंदिर का पुनर्निर्माण वर्ष 2003 में पुरातत्व विभाग द्वारा कराया गया था। बारसूर से प्राप्त शिलालेख के अनुसार बत्तीसा मंदिर का निर्माण ईस्वी सन् 1030 में नागवंशीय नरेश सोमेश्वरदेव ने अपनी रानी के लिए करवाया था। यहां के दो शिवालय में राजा और रानी शिव की अलग-अलग आराधना करते थे।


पिछले 800 सालों से बस्तर में आज भी विराजमान है जुड़वां गणेश जी ,बस्तर के मंदिरों के शहर (City Of Temples) में है जुड़वा गणेश (Twin Ganesh), जो दुनिया में तीसरी सबसे बड़ी मूर्ति मानी जाती है।

 दंतेवाड़ा जिले के जंगलों के बीच एक अनोखा गणेश मंदिर है। यहां विघ्नहर्ता का जुड़वां स्वरुप विराजित है। जी हां बारसूर इलाके में जुड़वां गणपति है। यहां बप्पा की एक जैसी 2 मूर्तियां है। फर्क बस इतना है कि एक बड़ी तो दूसरी छोटी है। इन मूर्तियों की खासियत ये है कि यह दोनों ही मोनोलिथिक है। लोगों की मान्यताएं है कि यहां आकर दर्शन करने वालों के कष्ट विघ्नहर्ता हर लेते है।

बालू के पत्थरों से निर्मित है ये प्रतिमाएं

ये दोनों मूर्तियां मोनोलिथिक हैं। यानि कि एक चट्टान को बिना काटें छांटे और बिना जोड़े-तोड़े बनाई गई मूर्तियां। इन मूर्तियों को गढऩे में कलाकार ने गजब कलाकारी दिखाई है। जहां एक मूर्ति में लड्डू छुपा के या संभाल के रखे गए है तो वही दूसरी मूर्ति में बप्पा इन लड्डुओं का भोग लगा चुके है। कलाकार ने एक ही पत्थर में 2 अलग-अलग भाव दर्शा दिए है। ये दोनों मूर्तियां बालू यानि रेत के चट्टानों से बनी हुई है।

विलक्षण है एक ही मंदिर में 2 मूर्तियों का होना
एक ही मंदिर में 2 अष्ट विनायक की 2 प्रतिमाओं का होना अपने आप में ही दुर्लभ है। यहां गणपति की बड़ी मूर्ति साढ़े सात फीट तथा छोटी मूर्ति साढ़े 5 फीट लम्बी है। इस मूर्ति को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी प्रतिमा माना जाता है। स्थानीय लोग बताते है कि ये मंदिर यहां के राजा ने अपनी बेटी के लिए बनवाया था।
वैसे तो ये मंदिर शिव को समर्पित है, लेकिन इसका नाम 'मामा-भांजा मंदिर' है।
कहा जाता है कि 'मामा' और 'भांजा' दो शिल्पकार थे, जिन्हें ये मंदिर सिर्फ एक दिन में ही पूरा करने का काम मिला था। उन दोनों ने मंदिर एक दिन में बना दिया था।
मंदिर 'भारतीय पुरातत्त्व विभाग' की देखरेख में है, लेकिन यहाँ कोई बोर्ड आदि नहीं लगा है, जिससे कोई भी दिशा-निर्देश और मंदिर कब बना, क्यूँ बना, कैसे बना आदि का पता नहीं लग पाता।
'मामा-भांजा मंदिर' काफ़ी ऊँचा है और इसमें ऊपर दो तरफ़ मामा और भांजा की भी पत्थर की मूर्तियां बनायीं गयी हैं।
चन्द्रादित्य मंदिर का निर्माण नाग राजा जगदेेव भूूूषण  के करवाया था एवं उन्हीं के नाम पर इस मंदिर को जाना जाता है। यह एक शिव मंदिर है। बत्तीस स्तंभों पर खड़े बत्तीसा मंदिर का निर्माण बलुआ पत्थर से हुआ है। इसका निर्माण नागवंशी शासक सोमेस्वर देव के शासन काल में उनकी महरानी गंग महादेवी के द्वारा कराया गया था।

Blogger :- Pushkar mishra 📝🖋️

बुधवार, 5 मई 2021

लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर, खरौद छत्तीसगढ़

लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से १२० कि॰मी॰ तथा संस्कारधानी शिवरीनारायण से ३ कि॰मी॰ की दूरी पर बसे खरौद नगर में स्थित है। यह नगर प्राचीन छत्तीसगढ़ के पाँच ललित कला केन्द्रों में से एक हैं और मोक्षदायी नगर माना जाने के कारण इसे छत्तीसगढ़ की काशी भी कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि यहाँ रामायण कालीन शबरी उद्धार और लंका विजय के निमित्त भ्राता लक्ष्मण की विनती पर श्रीराम ने खर और दूषण की मुक्ति के पश्चात 'लक्ष्मणेश्वर महादेव' की स्थापना की थी।

लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर में स्थित शिवलिंग
मूल मंदिर के प्रवेश द्वार के उभय पार्श्व में कलाकृति से सुसज्जित दो पाषाण स्तम्भ हैं। इनमें से एक स्तम्भ में रावण द्वारा कैलासोत्तालन तथा अर्द्धनारीश्वर के दृश्य खुदे हैं। इसी प्रकार दूसरे स्तम्भ में राम चरित्र से सम्बंधित दृश्य जैसे राम-सुग्रीव मित्रता, बाली का वध, शिव तांडव और सामान्य जीवन से सम्बंधित एक बालक के साथ स्त्री-पुरूष और दंडधरी पुरुष खुदे हैं। प्रवेश द्वार पर गंगा-यमुना की मूर्ति स्थित है। मूर्तियों में मकर और कच्छप वाहन स्पष्ट दिखाई देते हैं। उनके पार्श्व में दो नारी प्रतिमाएँ हैं। इसके नीचे प्रत्येक पार्श्व में द्वारपाल जय और विजय की मूर्ति है। लक्ष्मणेश्वर महादेव के इस मंदिर में सावन मास में श्रावणी और महाशिवरात्रि में मेला लगता है।
यह मंदिर नगर के प्रमुख देव के रूप में पश्चिम दिशा में पूर्वाभिमुख स्थित है। मंदिर में चारों ओर पत्थर की मजबूत दीवार है। इस दीवार के अंदर ११० फीट लंबा और ४८ फीट चौड़ा चबूतरा है जिसके ऊपर ४८ फुट ऊँचा और ३० फुट गोलाई लिए मंदिर स्थित है। मंदिर के अवलोकन से पता चलता है कि पहले इस चबूतरे में बृहदाकार मंदिर के निर्माण की योजना थी, क्योंकि इसके अधोभाग स्पष्टत: मंदिर की आकृति में निर्मित है। चबूतरे के ऊपरी भाग को परिक्रमा कहते हैं। मंदिर के गर्भगृह में एक विशिष्ट शिवलिंग की स्थापना है। इस शिवलिंग की सबसे बडी विशेषता यह है कि शिवलिंग में एक लाख छिद्र है इसीलिये इसका नाम लक्षलिंग भी है। सभा मंडप के सामने के भाग में सत्यनारायण मंडप, नन्दी मंडप और भोगशाला हैं।
मंदिर के मुख्य द्वार में प्रवेश करते ही सभा मंडप मिलता है। इसके दक्षिण तथा वाम भाग में एक-एक शिलालेख दीवार में लगा है। दक्षिण भाग के शिलालेख की भाषा अस्पष्ट है अत: इसे पढ़ा नहीं जा सकता। उसके अनुसार इस लेख में आठवी शताब्दी के इन्द्रबल तथा ईशानदेव नामक शासकों का उल्लेख हुआ है। मंदिर के वाम भाग का शिलालेख संस्कृत भाषा में है। इसमें ४४ श्लोक है। चन्द्रवंशी हैहयवंश में रत्नपुर के राजाओं का जन्म हुआ था। इनके द्वारा अनेक मंदिर, मठ और तालाब आदि निर्मित कराने का उल्लेख इस शिलालेख में है। तदनुसार रत्नदेव तृतीय की राल्हा और पद्मा नाम की दो रानियाँ थीं। राल्हा से सम्प्रद और जीजाक नामक पुत्र हुए। पद्मा से सिंहतुल्य पराक्रमी पुत्र खड्गदेव हुए जो रत्नपुर के राजा भी हुए जिसने लक्ष्मणेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। इससे पता चलता है कि मंदिर आठवीं शताब्दी तक जीर्ण हो चुका था जिसके उद्धार की आवश्यकता पड़ी। इस आधार पर कुछ विद्वान इसको छठी शताब्दी का मानते हैं l
  
मान्यता है कि मंदिर के गर्भगृह में श्रीराम के अनुज लक्ष्मण के द्वारा स्थापित लक्ष्यलिंग स्थित है। इसे लखेश्वर महादेव भी कहा जाता है क्योंकि इसमें एक लाख लिंग है। इसमें एक पातालगामी लक्ष्य छिद्र है जिसमें जितना भी जल डाला जाय वह उसमें समाहित हो जाता है। इस लक्ष्य छिद्र के बारे में कहा जाता है कि मंदिर के बाहर स्थित कुंड से इसका सम्बंध है। इन छिद्रों में एक ऐसा छिद्र भी है जिसमें सदैव जल भरा रहता है। इसे अक्षय कुंड कहते हैं।
 स्वयंभू लक्ष्यलिंग के आस पास वर्तुल योन्याकार जलहरी बनी है। मंदिर के बाहर परिक्रमा में राजा खड्गदेव और उनकी रानी हाथ जोड़े स्थित हैं। 
प्रति वर्ष यहाँ महाशिवरात्रि के मेले में शिव की बारात निकाली जाती है। छत्तीसगढ़ में इस नगर की काशी के समान मान्यता है कहते हैं भगवान राम ने इस स्थान में खर और दूषण नाम के असुरों का वध किया था इसी कारण इस नगर का नाम खरौद पड़ा। यहा खरौद की छत्तीसगढ़ का काशी है।

लेखक:- पुष्कर मिश्रा 📝🖋️

मंगलवार, 4 मई 2021

भगवान विष्णु मंदिर, जांजगीर-चांपा छत्तीसगढ़


छत्तीसगढ़ के इस दक्षिण कोशल क्षेत्र में कल्चुरी नरेश जाज्वल्य देव प्रथम ने भीमा तालाब के किनारे ११ वीं शताब्दी में एक मंदिर का निर्माण करवाया था। यह मंदिर भारतीय स्थापत्य का अनुपम उदाहरण है। मंदिर पूर्वाभिमुखी है, तथा सप्तरथ योजना से बना हुआ है। मंदिर में शिखर हीन विमान मात्र है। गर्भगृह के दोनो ओर दो कलात्मक स्तंभ है जिन्हे देखकर यह आभास होता है कि पुराने समय में मंदिर के सामने महामंडप निर्मित था। परन्तु कालांतर में नहीं रहा। मंदिर का निर्माण एक ऊँची जगती पर हुआ है।
मंदिर के चारों ओर अत्यन्त सुंदर एवं अलंकरणयुक्त प्रतिमाओ का अंकन है जिससे तत्कालीन मूर्तिकला के विकास का पता चलता है। गर्भगृह के प्रवेश द्वार के दोनो ओर देवी गंगा और जमुना के साथ द्वारपाल जय-विजय स्थित हैं। इसके अतिरिक्त त्रिमूर्ति के रूप में ब्रह्मा, विष्णु और महेश की मूर्ति है।


 ठीक इसके ऊपर गरुणासीन भगवान विष्णु की मूर्ति स्थित है। मंदिर की जगती के दोनों फलक में अलग-अलग दृश्य अंकित हैं। एक फलक पर धनुर्धारी राम, सीता, लक्ष्मण तथा रावण और मृग अंकित हैं। दूसरे फलक पर रावण का भिक्षाटन और सीता हरण के दृश्य है। मंदिर के श्री राम द्वारा मृग वध और रावण द्वारा सीता हरण के दृश्य को मंदिर के प्रवेशद्वार के दोनों पार्शवों पर दो-दो के जोड़े में अर्द्ध स्तम्भ हैं जो दो मुख्य खंडों में बँटे हैं। 
इसमें लंबोदर तथा त्रिशीर्ष मुकुट युक्त कुबेर का अंकन है। मंदिर के शिखर में मृदंगवादिनी, पुरुष से आलिंगनबद्ध मोहिनी, खड्गधारी, नृत्यांगना मंजुघोषा, झांझर बजाती हंसावली आदि देवांगनाएँ अंकित हैं। मंदिर की उत्तरी जंघा में आंखों में अंजन लगाती अलसयुक्त लीलावती, चंवरधारी चामरा, बांसुरी बजाती वंशीवादिनी, मृदंगवादिनी, दर्पण लेकर बिंदी लगाती विधिवेत्ता आदि देवांगनाएं स्थित हैं। दक्षिण जंघा में वीणा वादिनी सरस्वती, केश गुम्फिणी, लीलावती, हंसावली, मानिनी, चामरा आदि देवांगनाएँ स्थित हैं।
खोजकर्ताओं द्वारा ली गई मंदिर की प्राचीन तस्वीर  

किंवदंती
इस मंदिर के निर्माण से संबंधित अनेक जनुश्रुतियाँ प्रचलित हैं। एक दंतकथा के अनुसार एक निश्चित समयावधि (कुछ लोग इस छैमासी रात कहते हैं) में शिवरीनारायण मंदिर और जांजगीर के इस मंदिर के निर्माण में प्रतियोगिता थी। 
भगवान नारायण ने घोषणा की थी कि जो मंदिर पहले पूरा होगा, वे उसी में प्रविष्ट होंगे। शिवरीनारायण का मंदिर पहले पूरा हो गया और भगवान नारायण उसमें प्रविष्ट हुए। जांजगीर का यह मंदिर सदा के लिए अधूरा छूट गया। एक अन्य दंत कथा के अनुसार इस मंदिर निर्माण की प्रतियोगिता में पाली के शिव मंदिर को भी सम्मिलित बताया गया है। इस कथा में पास में स्थित शिव मंदिर को इसका शीर्ष भाग बताया गया है। 

लेखक :- पुष्कर मिश्रा 📝🖋️

नारायण पाल मंदिर, बस्तर छत्तीसगढ़

बस्तर के संभागीय मुख्यालय से मात्र 40 किलोमीटर दूर है नारायणपाल मंदिर, निर्माण शैली वास्तुकला भी बेजोड़ है। जगदलपुर में इंद्रावत...