गुरुवार, 6 मई 2021

बारसूर गणेश जी मंदिर, दंतेवाड़ा छत्तीसगढ़



दक्षिण बस्तर दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय से 31 किमी तथा राजधानी से 395 किमी दूर बारसूर में स्थित है, 32 खंबों वाला यह ऐतिहासिक मंदिर। दो गर्भगृह वाले इस मंदिर में दो शिवलिंग स्थापित हैं। 895 वर्ष पुराने इस मंदिर का पुनर्निर्माण वर्ष 2003 में पुरातत्व विभाग द्वारा कराया गया था। बारसूर से प्राप्त शिलालेख के अनुसार बत्तीसा मंदिर का निर्माण ईस्वी सन् 1030 में नागवंशीय नरेश सोमेश्वरदेव ने अपनी रानी के लिए करवाया था। यहां के दो शिवालय में राजा और रानी शिव की अलग-अलग आराधना करते थे।


पिछले 800 सालों से बस्तर में आज भी विराजमान है जुड़वां गणेश जी ,बस्तर के मंदिरों के शहर (City Of Temples) में है जुड़वा गणेश (Twin Ganesh), जो दुनिया में तीसरी सबसे बड़ी मूर्ति मानी जाती है।

 दंतेवाड़ा जिले के जंगलों के बीच एक अनोखा गणेश मंदिर है। यहां विघ्नहर्ता का जुड़वां स्वरुप विराजित है। जी हां बारसूर इलाके में जुड़वां गणपति है। यहां बप्पा की एक जैसी 2 मूर्तियां है। फर्क बस इतना है कि एक बड़ी तो दूसरी छोटी है। इन मूर्तियों की खासियत ये है कि यह दोनों ही मोनोलिथिक है। लोगों की मान्यताएं है कि यहां आकर दर्शन करने वालों के कष्ट विघ्नहर्ता हर लेते है।

बालू के पत्थरों से निर्मित है ये प्रतिमाएं

ये दोनों मूर्तियां मोनोलिथिक हैं। यानि कि एक चट्टान को बिना काटें छांटे और बिना जोड़े-तोड़े बनाई गई मूर्तियां। इन मूर्तियों को गढऩे में कलाकार ने गजब कलाकारी दिखाई है। जहां एक मूर्ति में लड्डू छुपा के या संभाल के रखे गए है तो वही दूसरी मूर्ति में बप्पा इन लड्डुओं का भोग लगा चुके है। कलाकार ने एक ही पत्थर में 2 अलग-अलग भाव दर्शा दिए है। ये दोनों मूर्तियां बालू यानि रेत के चट्टानों से बनी हुई है।

विलक्षण है एक ही मंदिर में 2 मूर्तियों का होना
एक ही मंदिर में 2 अष्ट विनायक की 2 प्रतिमाओं का होना अपने आप में ही दुर्लभ है। यहां गणपति की बड़ी मूर्ति साढ़े सात फीट तथा छोटी मूर्ति साढ़े 5 फीट लम्बी है। इस मूर्ति को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी प्रतिमा माना जाता है। स्थानीय लोग बताते है कि ये मंदिर यहां के राजा ने अपनी बेटी के लिए बनवाया था।
वैसे तो ये मंदिर शिव को समर्पित है, लेकिन इसका नाम 'मामा-भांजा मंदिर' है।
कहा जाता है कि 'मामा' और 'भांजा' दो शिल्पकार थे, जिन्हें ये मंदिर सिर्फ एक दिन में ही पूरा करने का काम मिला था। उन दोनों ने मंदिर एक दिन में बना दिया था।
मंदिर 'भारतीय पुरातत्त्व विभाग' की देखरेख में है, लेकिन यहाँ कोई बोर्ड आदि नहीं लगा है, जिससे कोई भी दिशा-निर्देश और मंदिर कब बना, क्यूँ बना, कैसे बना आदि का पता नहीं लग पाता।
'मामा-भांजा मंदिर' काफ़ी ऊँचा है और इसमें ऊपर दो तरफ़ मामा और भांजा की भी पत्थर की मूर्तियां बनायीं गयी हैं।
चन्द्रादित्य मंदिर का निर्माण नाग राजा जगदेेव भूूूषण  के करवाया था एवं उन्हीं के नाम पर इस मंदिर को जाना जाता है। यह एक शिव मंदिर है। बत्तीस स्तंभों पर खड़े बत्तीसा मंदिर का निर्माण बलुआ पत्थर से हुआ है। इसका निर्माण नागवंशी शासक सोमेस्वर देव के शासन काल में उनकी महरानी गंग महादेवी के द्वारा कराया गया था।

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